ढाबे वाला छोटू
आज के इस डिजिटल युग में, हममें से हर एक व्यक्ति कुछ ना कुछ जुगाड़ लगा कर अपना और अपने परिवार के खाने-पीने की व्यवस्था कर हीं लेता है। हमारा भारत अभी भी पूर्ण रूप से विकसित और संपन्न नहीं हुआ है। कुछ बुरे पारम्परिक कुरीतिया जिसके वजह से हमारा देश पिछड़ा हुआ था, उससे छुटकारा पाने के लिए हमारे देश की सरकार निरंतर प्रयास कर रही है।
पहले हमारे देश में छोटे-छोटे बच्चे गरीबी के कारण पढ़-लिख नहीं पाते थे। उन्हें उनके अधिकारों का ज्ञान नहीं था। फिर भी अपना पेट भरने के लिए वो पशु के भाँती, अपने से बेहतर और संपन्न लोगों के आगे-पीछे हाँथ फैला कर उनके रहमों की भीख से अपना पेट भर के जैसे-तैसे अपना जीवन-यापन करते थे। आसान शब्दों में कहें तो वो गरीबी से जूझ रहे थे, और आज भी कई जगहों पे ऐसे छोटे-छोटे बच्चे लोगों के आगे हाँथ फैला कर कुछ खाने की मांग करते हुए दिख जाते हैं।
हालांकि, हमारे देश के हालात अब सुधरते हुए दिख रहे हैं, फिर भी कुछ बच्चे बदकिस्मती के शिकार हैं।
ये कहानी ऐसे ही एक 9 वर्षीय छोटे बच्चे की है…
एक नदी किनारे, एक छोटा सा गावं है, अत्यधिक वर्षा के कारण इस गांव में बाढ़ आई, और सबकुछ तबाह हो गया। लोगों की झोपड़ी, और मवेशी सब बह गए। ऐसे हालात में छोटू नाम का एक लड़का, जिसके माता-पिता की मृत्यु बाढ़ के कारण हो गई थी। और अब, वो बिलकुल अकेला पड़ गया है।
उस लड़के के पास पैसे नहीं थे, जिससे वो, अपने पेट भरने के लिए, कुछ खरीद के खा सके। फिर भी, उसने अपना दिमाग लगाया, उसने अपने जीवन को आगे बढ़ाने के लिए एक कुत्ते से सीख ली। उसने देखा की कैसे एक कुत्ता लोगों के बीच जा कर पूछ हिलाते हुए खड़ा था, और लोग उसे प्यार से सहला कर, खेला कर कुछ बिस्किट दे रहे थे।
ऐसा देख कर छोटू ने सोंचा की अगर एक बेजुबान जानवर लोगो से मुफ्त में ले कर खा पा रहा है, तो फिर उसे तो बोलना आता है, क्यों ना वो भी मांग के खा ले?
ऐसा सोच कर उसने 3-4 जगह हाथ फैला कर लोगों से कुछ खाने के लिए माँगा, कुछ लोगों ने उसे डांट कर भगा दिया, और कुछ लोगों ने उसे एक-दो रूपये दे दिया। किसी तरह, उसने दिन भर में 20 से 30 रूपए जमा किया और सोने के पहले उसने एक-दो लिट्टी खाया, चापा-कल से पानी पिया और फिर थक कर एक पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर सो गया।
अगले दिन जब उसकी नींद खुली तो सूर्य की तेज धूप की किरण उसके माथे पर पड़ रही थी। उसे बेहद गर्मी और प्यास लग रही थी। एक ढाबे के किनारे बने चापा-कल से उसने अपने मुख पर पानी छपाके मारे, और थोड़ा पानी पी कर उसने खुद को स्थिर किया। उसने फिर से लोगों से कुछ खाने, या फिर कुछ पैसों की मांग की।
उसे फिर से लोगों की प्रताड़ना और रहम की मार झेलनी पड़ी। जैसे-तैसे उसने अपने दोपहर तक के लिए कुछ खाने-पीने का जुगाड़ लोगों से मांग कर लिया।
तभी उसने देखा कि, सड़क किनारे एक बड़ी सी बिल्डिंग है, उस बिल्डिंग के विभिन्न फ्लोर पर अनेकों कॉर्पोरेट ऑफिस थे। छोटू कि नज़र उस बिल्डिंग के अंदर ग्राउंड फ्लोर पे रिसेप्शन काउंटर के पास बैठे एक लड़के पे पड़ी। वो लड़का काफी घबराया हुआ था। वो लड़का थोड़ी देर के लिए उस ऑफिस के डायरेक्टर के चैम्बर में गया, फिर थका हुआ सा उस बिल्डिंग से बाहर निकल आया। वो लड़का सड़क पार कर के, छोटू के पास चौराहे पे खड़ा हो कर ऑटो का इंतज़ार करने लगा। तभी, छोटू उस लड़के के पास गया और उससे भी कुछ खाने के लिए पैसा मांगने लगा। उस लड़के ने छोटू से कहा-
अनजान लड़का- देखो बच्चे, पैसे बहुत ही कीमती होते हैं। वो मुफ्त में नहीं मिलते, उसे कमाना पड़ता है। अगर आप बिना काम के पैसे मांगोगे तो कोई भी नहीं देगा। पैसे कमाने के लिए काम करना पड़ता है। मैं भी अंदर अपनी शिक्षा और काबिलियत के बदले दफ्तर में काम मांगने गया था, लेकिन मैं उनके काम को करने के योग्य खुद को साबित नहीं कर पाया, इसिलए मुझे काम नहीं मिला। अभी मेरे पास खुद के खर्चे उठाने के लायक पैसे नहीं है, मैं तुम्हे खाने के लिए पैसे कहाँ से दे दूँ। एक बात हमेशा याद रखना बच्चे, “अगर कोई काम करने के योग्य नहीं, तो फिर पैसे भी नहीं।” इतना कह, कर वो लड़का वहां से ऑटो में बैठ कर चला गया।
वो लड़का तो चला गया, लेकिन उसकी कही बातें छोटू के मन में चलने लगी। वो सारे दिन यहीं सोंचता रह गया। “काम नहीं तो पैसे भी नहीं।”
अगले दिन, छोटू ने यह तय किया कि वो अपने करने लायक काम ढूंढेगा, और फिर कमा कर खाएगा। ऐसे में वो कौन सा काम ढूंढता…
भटकते-भटकते काम ढूंढते-ढूँढ़ते वो एक ढाबे के पास पहुंचा, वहां पहुँच कर उसने जब काम के लिए पूछा, तब उस ढाबे के मालिक को उस पर दया आ गई। उसने कहा कि मेरी नज़र दो दिनों से तुम पर टिकी हुई है, तुम हर जगह काम के लिए पूछते हो और फिर निरास हो कर आगे बढ़ जाते हो। एक बात बताओ कि तुम्हारा घर कहाँ है, और तुम ऐसी हालत में कैसे पहुँच गए हो।
ये बात सुन कर छोटू ने अपना हाल कह सुनाया कि, कैसे उसका घर बाढ़ में बह गया और वो अपनों को खो गया। उसे कहीं भी काम नहीं मिल रहा है, और उसके पास खाने तक के पैसे नहीं हैं। ढाबे के मालिक ने कहा कि मेरे पास तुम्हारे लायक दो ही काम हैं, पहला बर्तन धोना, और दूसरा ढाबे में आए हुए लोगों को खाना परोसना और टेबल कुर्सी साफ़ करना। साथ ही तुम्हारे रहने और सोने लायक इस होटल का एक कोना भी दूंगा।
छोटू ने तुरंत ही काम के लिए हामी भर दी।
देखते-देखते 4 महीने बीत गए और छोटू वहां पर अच्छे से कमा कर खाने लगा। छोटू बड़ा ही खुश था। तभी एक दिन उस होटल में एक ऐसा शख्स आया जिसने छोटू कि ज़िन्दगी बदल दी।
आखिर कौन था वो शख्स….
वो शख्स एक एंटी चाइल्ड लेबर एन जी ओ में काम करता था। और एक्ट 1986 के मुताबिक 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को बाल श्रम करने से रोकने के लिए आवाज उठाता था। उसने जब छोटू को देखा तो उससे पूछताछ की, और जब उसे ये पता चला की छोटू की आयु सिर्फ 9 वर्ष है, तब उसने छोटू को उसका अधिकार बताया। उसने छोटू को बताया की, इस उम्र में तुम्हें पढ़ना चाहिए, ना की श्रम करना चाहिए।
ऐसा सुनकर छोटू ने कहा की, वो बड़ी मुश्किल से अपने रहने-खाने लायक कमा पाता है, इस हालात में वो पढ़ाई कैसे करेगा और उसके खर्चे कौन उठाएगा। ऐसा सुनकर उस शख्स ने उसे सरकार द्वारा उठाये जा रहे ठोस कदम के बारे में बताया और कहा की सरकारी स्कूल में उसे मुफ्त शिक्षा, स्कूल ड्रेस, और "मिड दे मील" के मदद एक वक़्त का खाना भी मिल जाएगा।
साथ ही एनजीओ की तरफ से भी उसके न्यायपूर्वक अच्छे शिक्षा को प्राप्त करने में सहायता मिलेगी। उसने आगे बताया- तुम पढ़ लिख कर जीवन में अच्छे फैसले ले सकते हो और इससे बेहतर कार्य करके अच्छा धन अर्जित कर सकते हो। शिक्षा तुम्हे में एक अच्छा भविष्य देगी।
छोटू ने उस शख्स की बात मान ली और बहुत जल्द वो शिक्षा प्राप्त करना शुरू कर दिया।
आगे चल कर वो पढ़ लिख कर एक सभ्य इंसान बना। लेकिन, वो उस ढाबे के वाले को नहीं भुला पाया था, जिसने उसके बुरे वक़्त में उसे काम देकर उसे सहारा दिया था। इसी को ध्यान में रखते हुए वो बड़े होने के बाद उस ढाबे में वापस गया।
ढाबे वाला बूढा हो चूका था। उसकी कोई संतान भी नहीं थी, अतः उस ढाबे वाले ने छोटू को अपना बेटा मान लिया। उसने अपने ढाबे का नाम “ढाबे वाला छोटू” रख दिया। छोटू की अक्ल और सूझ बूझ से, वो ढाबा आगे चाकर एक अच्छे रेस्टुरेंट में तब्दील हो गया।
आज भी जब छोटू उस काले अँधेरी बातों को याद करता है तो उसकी रूह काँप उठती है। वो बूढा ढाबे वाला, छोटू और उसके समझदारी से भरे तरक्की से बना रेस्टुरेंट देखता है, तो वो खुद को धन्य मानता है। उस रेस्टुरेंट का नाम आज भी “ढाबे वाला छोटू” है।
तो यही थी कहानी "ढाबे वाला छोटू" की।
The End
डिस्क्लेमर- यह कहानी पूरी तरह से लेखक की कल्पना है। सभी पात्र, लोग, स्थान काल्पनिक हैं। इसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है। यदि आप इस कहानी में दिखाई गई किसी घटना को किसी अन्य कहानी या व्यक्ति की वास्तविक कहानी के समान पाते हैं, तो यह केवल एक संयोग है। लेखक का उद्देश्य केवल दर्शकों का मनोरंजन करना है। लेखक कभी भी इस कहानी के माध्यम से किसी समुदाय को आहत नहीं करना चाहता। यदि कोई व्यक्ति इस कहानी को अपने आप से जोड़ता है और दावा करता है कि यह पहले से ही उसके साथ हुआ है तो यह सिर्फ एक संयोग मात्र है और उस मामले में लेखक जिम्मेदार नहीं है।